कैसे एक सिगरेट ब्रेक ने दिया ब्रह्मोस मिसाइल को जन्म, अब्दुल कलाम ने रूस के साथ मिलकर लगाया था जुगाड़

Origin Of Brahamos Missile: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल हो गए हैं. ऐसे में एक बार फिर भारत की मिसाइल ताकत चर्चा के केंद्र मे हैं. भारत की मिसाइल ब्राह्मोस को लेकर भी दुनिया में उत्सुकता रहती है. इस मिसाइल से भारत की निर्णायक स्ट्राइक मानी जाती है. इसी सिलसिले में एबीपी न्यूज (The Journey With Romana) से एक इंटरव्यू में DRDO के पूर्व चीफ रहे डॉ. सुधीर ने भारत की डिफेंस ताकत पर खुलकर चर्चा की है.

इस दौरान उन्होंने ब्रह्मोस मिसाइळ को लेकर भी कई बातें साझा की हैं. इस मिसाइल को भारत और रूस ने मिलकर बनाया है. इसको बनाने की शुरुआत कैसे हुई. आइए उन्होंने क्या बताया जानते हैं. 

रूस और भारत की आर्थिक स्थिति नहीं थी ठीक

1990 में सोवियत संघ टूट गया था, तब रूस बना और उस समय भारत की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. हमने अपना गोल्ड तक गिरवी रख दिया था. दोनों देशों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. ऐसे में दोनों देशों के पास सवाल एक ही था कि आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते नए हथियार कैसे बनाएं?

उस समय खाड़ी युद्ध इराक और यूएस के बीच हुआ था. तब यह सबसोनिक मिसाइल जैसे टॉम हॉन्क काफी संख्या में उपयोग हुईं थी. उस युद्ध में मजबूत ईराक पूरी तरह से तबाह हो गया था. ईराक को तबाह करने में टॉम हॉन्क मिसाइल का महत्वपूर्ण योगदान था. 

जब अब्दुल कलाम ने रूस से पूछा- मिसाइल पर क्या काम हो रहा?

ऐसे में हम हमारे पास न सबसोनिक मिसाइल थीं, और न ही सुपरसोनिक. उस समय पूर्व राष्ट्रपति रहे अब्दुल कलाम गए थे, रूस. रूस में उस वक्त सिगरेट ब्रेक हुआ करते थे. वहां एक बैठक के दौरान सिगरेट ब्रेक हुआ. तब न अब्दुल कलाम सिगरेट पीते थे और न ही उनके  समकक्ष  सिगरेट पीते थे. दोनों कमरे में रुके हुए थे. दोनों साइंटिस्ट थे. इस दौरान उन्होंने मिसाइल को लेकर बातचीत की. तब अब्दुल कलाम ने पूछा कि और मिसाइल को लेकर क्या काम हो रहा है?

कैसे अस्तित्व में आई Brahmos Aerospace कंपनी

इस पर उनके समकक्ष और रूसी साइंटिस्ट बोले कि हम एक सुपरसोनिक इंजन डेवलप कर रहे थे. हमने उसे काफी डेवलप किया लेकिन फिर पैसे खत्म हो गए. आधा बना हुआ है. कलाम साहब ने उस आधे बने हुए इंजन को देखा. इस पर कलाम साहब ने कहा कि एक काम करते हैं. हमने इंटीग्रेटेड मिसाइल पर काफी काम किया हुआ है, बहुत सारी मिसाइल हैं, जिनमें हमने उन्हें डेवलप किया हुआ है. तो जो वो तकनीक है, हम उन मिसाइलों से लेकर इसमें मॉडिफाई करके लगाएंगे, उसमें आपका इंजन ले लेंगे.

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साथ ही उस वक्त भारत को रूस से लिया हुआ लोन लेना था,  तो अब्दुल कलाम ने कहा कि हम एक कंपनी बनाते हैं, आपको फिजिक्ल कोई रुपए नहीं देना, बस पेपर्स पर देना है. ऐसे में मनी ट्रांसफर हो गई, ब्राम्होस एयर स्पेस के नाम से. इसमें 250 मिलियन डॉलर का आधा हिस्सा दोनों देश देंगे. भारत पर उस वक 1 बिलियन डॉलर का कर्ज था और भारत पर उस समय देने की स्थिति में नहीं था. इस प्रक्रिया को होने में करीबन 7 से 8 साल लगे. इसके बाद दोनों सरकार में 1998 में एक एग्रीमेंट हुआ. इसके बाद इंजन से जुड़ा हिस्सा रूस ने तैयार किया और बाकी तकनीक और अन्य हिस्से मिसाइल के भारत ने तय किया. तीन साल में दोनों देशों ने मिलकर इंटीग्रेटेड सिस्टम तैयार किया और 2001 में ब्राम्होस मिसाइल का परिक्षण किया. इसके बाद वॉर शिप्स पर भी इनका परीक्षण किया गया. रूस और भारत एक दूसरे के साथ भाई की तरह मिलकर काम करते हैं. 

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