भोजशाला विवाद: MP हाई कोर्ट के फैसले पर ओवैसी का हमला, लगाया आरोप- ‘आपस में मिले हुए हैं सरकार और ASI’

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  • धार की भोजशाला को हाई कोर्ट ने माना सरस्वती मंदिर, पुरातात्विक सबूतों का समर्थन।
  • मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए वैकल्पिक जमीन का प्रस्ताव अदालत ने दिया।
  • असदुद्दीन ओवैसी ने बाबरी मस्जिद फैसले से तुलना कर फैसले को पलटने की मांग।
  • हाई कोर्ट ने पुराने आदेश को रद्द किया, ASI की रिपोर्ट पर विचार किया।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला परिसर विवाद पर कड़े बयान दिए हैं. उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ बात की, जिसमें विवादित क्षेत्र को एक मंदिर घोषित किया गया था. उन्होंने केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भी निशाने पर लिया.

ओवैसी ने छह मुख्य बिंदु गिनाते हुए तर्क दिया कि अदालत का फैसला गलत है. उन्होंने कहा कि मस्जिद वहां 700 सालों से खड़ी है और वहां नियमित रूप से नमाज अदा की जाती है. उन्होंने कहा कि यह एक वक्फ संपत्ति है, जिसे पूर्व धार रियासत ने मुसलमानों को दिया था. उन्होंने 1935 के धार रियासत गजट का जिक्र किया, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि यह जगह एक मस्जिद है.

ओवैसी ने कोर्ट के फैसले को बताया गलत

असदुद्दीन ओवैसी ने यह भी कहा कि 1985 का वक्फ गजट और पूजा स्थल अधिनियम 1991 इस स्थल के धार्मिक स्वरूप की रक्षा करते हैं, जैसा कि 15 अगस्त 1947 को था. उन्होंने आगे कहा कि 1951 और 1952 के ASI के आदेशों ने पहले ही इसे एक मस्जिद के रूप में पुष्टि कर दी थी और भोज उत्सव के लिए की गई याचिकाओं को खारिज कर दिया था.

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उन्होंने अदालत के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताया, क्योंकि इसने 1935 के गजट, वक्फ पंजीकरण और ‘पूजा स्थल अधिनियम’ को नज़रअंदाज़ कर दिया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मोदी सरकार और ASI याचिकाकर्ताओं के साथ मिले हुए हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 12 का उल्लंघन है.

कोर्ट के फैसले के बाद ओवैसी ने की टिप्पणी

ओवैसी ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार (15 मई, 2026) को भोजशाला परिसर पर अपना फैसला सुनाया. अदालत ने विवादित क्षेत्र को एक मंदिर घोषित किया था. ओवैसी की प्रतिक्रिया फैसले के तुरंत बाद आई. यह विवाद मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है. इस स्थल को भोजशाला परिसर के नाम से जाना जाता है. इसका एक हिस्सा एक मस्जिद है, जहां मुसलमान नमाज अदा करते हैं. अदालत का आदेश विवादित क्षेत्र की स्थिति को बदल देता है.

ओवैसी ने ये बयान अदालत के फैसले को चुनौती देने और मुस्लिम पक्ष का बचाव करने के लिए दिए. वह यह दिखाना चाहते हैं कि यह फैसला ऐतिहासिक अभिलेखों, वक्फ कानूनों और ‘पूजा स्थल अधिनियम’ को नज़रअंदाज़ करता है. उन्होंने प्रशासन पर दबाव डालने के लिए सरकार पर पक्षपात का आरोप भी लगाया. ओवैसी ने एक-एक करके अपनी दलीलें रखीं. उन्होंने 1935 के गजट में दर्ज जानकारी और 1985 के वक्फ रजिस्ट्रेशन को पढ़कर सुनाया.

ओवैसी के बयानों के बाद मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज

उन्होंने यह भी कहा कि 1995 में, धार के कुछ असरदार मुसलमानों ने यह मानकर गलती की थी कि वे हर मंगलवार और बसंत पंचमी को मस्जिद के अंदर पूजा करने की इजाज़त देंगे. उन्होंने कहा कि इस समझौते से मस्जिद का मूल स्वरूप नहीं बदलना चाहिए. इसके बाद उन्होंने अदालत पर आरोप लगाया कि उसने 1935 की अधिसूचना को महज़ एक प्रशासनिक व्यवस्था कहकर खारिज कर दिया, जिसे उन्होंने बेतुका बताया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि खुद PIL ही दोषपूर्ण थी. उनके बयानों ने अब इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस को और तेज़ कर दिया है.

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