हाल ही में लागू किए गए यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत हासिल विशेष शक्ति का प्रयोग करते हुए कहा है कि फिलहाल 2012 में बने यूजीसी के नियम ही सभी कॉलेजों पर लागू रहेंगे. चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने नए नियमों पर चिंता जताते हुए कहा कि इनके दुरुपयोग की आशंका है. पहली नजर में यह नियम समाज में विभेद पैदा करने वाले लग रहे हैं.
क्या है मामला?
यूजीसी (विश्विद्यालय अनुदान आयोग) ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नए नियम अधिसूचित किए थे. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि नियमों में केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के खिलाफ भेदभाव का उल्लेख है. इसमें सामान्य वर्ग को भेदभाव का शिकार मानने की कोई व्यवस्था नहीं है. साथ ही, शिकायत झूठी पाए जाने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ किसी कार्रवाई की व्यवस्था भी नए नियमों में नहीं की गई है.
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ता पक्ष की तरफ से विष्णु शंकर जैन समेत अन्य वकीलों ने जिरह की. उन्होंने नए विनियम के नियम 3(c) का विरोध किया. इसी धारा में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए अलग से व्यवस्था की गई है. वकीलों ने कहा कि नियम 3(e) पहले से मौजूद है. यह नियम जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग और शारीरिक बनावट समेत तमाम आधारों पर भेदभाव की मनाही करता है. ऐसे में 3(c) की कोई जरूरत नहीं थी. इसमें सिर्फ 3 वर्गों को पीड़ित माना गया है. सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए बड़ी मुश्किल स्थिति बन जाएगी.
जजों ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच याचिकाकर्ता पक्ष की बातों से प्रथमदृष्टया सहमत नजर आई. बेंच ने कहा, ‘यह नियम पूरी तरह अस्पष्ट हैं. इसके प्रावधानों के दुरुपयोग की संभावना है. इनकी भाषा को दोबारा गढ़ने या स्पष्ट करने की जरूरत लगती है.’
‘समाज की एकता की हो कोशिश’
चीफ जस्टिस ने कहा, ‘आजादी के 75 सालों में हमने जातिरहित समाज की दिशा में प्रगति की है. क्या हम अब पीछे जा रहे हैं? हर वर्ग के लोग हॉस्टल में एक साथ रहते आए हैं. युवा अंतर्जातीय विवाह को भी अपना रहे हैं. अगर कॉलेज कैंपस में ही जातीय विवाद शुरू हो गया तो समाज किस दिशा में जाएगा?’
‘सबको संरक्षण मिलना जरूरी’
याचिकाकर्ता पक्ष के एक वकील को नोट करते हुए बेंच ने कहा कि कॉलेज में रैगिंग अब भी होती है. इससे सभी वर्ग के छात्रों को बचाने की जरूरत है. नियम 3(e) की बात करते हुए जजों ने कहा कि यह हर तरह के भेदभाव की चर्चा करता है. अगर दक्षिण भारत का या पूर्वोत्तर का कोई छात्र उत्तर भारत के कॉलेज में भेदभाव का शिकार होता है तो उसे भी संरक्षण मिलना चाहिए.
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए 13 जनवरी को लागू किए गए रेगुलेशंस पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने यह संकेत भी दिया है कि मामले के परीक्षण के लिए विशेषज्ञ कमेटी बनाई जा सकती है. मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी. कोर्ट यह जानना चाहता है कि क्या नई नियमावली के विवादित नियमों को इस तरीके से लिखा जा सकता है, जो कि समावेशी और सब के साथ न्याय करने वाला हो.