तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के तांसी मंडल के देवुनूर गांव की रहने वाली 8वीं कक्षा की छात्रा साई लिखिता की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है. तीन महीने पहले हुई इस मासूम की मौत के बाद अब उसके शव को दोबारा पोस्टमार्टम के लिए कब्र से बाहर निकाला गया, जिससे परिवार का दर्द एक बार फिर ताजा हो गया.
क्या है पूरा मामला?
साई लिखिता निजामाबाद जिले के पोचमपाड स्थित सोशल वेलफेयर स्कूल में पढ़ती थी. 8 दिसंबर को स्कूल प्रशासन ने बच्ची की तबीयत खराब होने की सूचना उसके माता-पिता को दी. घबराए हुए माता-पिता तुरंत उसे हैदराबाद के निलोफर अस्पताल ले गए, जहां वह कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझती रही. आखिरकार 16 दिसंबर को उसने दम तोड़ दिया.
बेटी की मौत के बाद भी परिवार को सच्चाई नहीं मिल पाई. किसी ने कहा कि उसकी मौत डेंगू से हुई, तो किसी ने पीलिया (जॉन्डिस) को वजह बताया. इन अलग-अलग कारणों ने माता-पिता के मन में गहरे संदेह पैदा कर दिए. उन्होंने न्याय की मांग करते हुए स्कूल के बाहर शव के साथ धरना भी दिया और तुरंत पोस्टमार्टम की मांग की. लेकिन आरोप है कि उस समय मेंडोरा पुलिस स्टेशन की एसआई सुहासिनी ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया.
इंसाफ के लिए बच्ची के माता पिता ने नहीं मानी हार
निराश और टूट चुके माता-पिता ने हार नहीं मानी. उन्होंने निजामाबाद के पुलिस कमिश्नर साई चैतन्य से गुहार लगाई. उनकी पीड़ा को समझते हुए कमिश्नर ने तुरंत मामले में हस्तक्षेप किया और दोबारा पोस्टमार्टम के आदेश जारी किए. इसके बाद तीन महीने पहले दफनाए गए मासूम के शव को फिर से बाहर निकाला गया. उस पल को देख कर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं. डॉक्टरों ने मौके पर ही दोबारा पोस्टमार्टम किया, ताकि मौत की असली वजह सामने आ सके.
यह घटना सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल है जहां एक मासूम की मौत के बाद भी उसके माता-पिता को सच्चाई के लिए महीनों तक भटकना पड़ता है. अब सबकी निगाहें पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो शायद इस दर्दनाक कहानी को न्याय दिला सके.