पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को वोटिंग पूरी होने के बाद एग्जिट पोल जारी हुए. इनमें 5 एग्जिट पोल ने बीजेपी को बंगाल में क्लीन स्वीप दिया. यानी अब ममता बनर्जी को दोबारा मौका मिलता नहीं दिख रहा. बंगाल में बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा, लेकिन अब CM की रेस भी शुरू हो चुकी है. राज्य में बीजेपी के 4 बड़े नाम हैं, जो CM पद के दावेदार माने जा रहे हैं. अगर कमल खिला तो कुर्सी पर कौन बैठेगा? जानेंगे एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: क्या 7 में से 5 एग्जिट पोल सचमुच बंगाल में बीजेपी की सरकार बनते दिखा रहे हैं?
जवाब: जी हां, 7 में से 5 एग्जिट पोल्स एक ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का संकेत दे रहे हैं. 5 एग्जिट पोल्स बीजेपी को स्पष्ट बढ़त दे रहे हैं, जिससे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) का लगातार चौथी बार सत्ता में बने रहना मुश्किल दिख रहा है.
294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 148 है और पांच अलग-अलग पोल के अनुमान:
- ‘पी-मार्क’ ने बीजेपी को 150-175 सीटें और TMC को 118-138 सीटें दी हैं.
- ‘मैट्रिज’ ने बीजेपी का पलड़ा भारी बताते हुए उसे 146-161 सीटें और TMC को 125-140 सीटें दी हैं.
- ‘चाणक्य स्ट्रेटेजीज’ ने बीजेपी को 150-160 और TMC को 130-140 सीटों के बीच रखा है .
- ‘पोल डायरी’ के मुताबिक बीजेपी को 142-171 सीटें मिल सकती हैं, जबकि TMC 99-127 सीटों पर सिमट सकती है.
- ‘प्रजा पोल’ का अनुमान तो और भी निर्णायक है, जिसने बीजेपी को 178-208 सीटें और TMC को केवल 85-110 सीटें देकर एकतरफा जीत का संकेत दिया है.
इसके उलट, ‘पीपुल्स पल्स’ और ‘जनमत’ पोल ने TMC की वापसी का अनुमान लगाया है. पीपुल्स पल्स ने TMC को 177-189 और जनमत ने 195-205 सीटें दी हैं. हालांकि, कुल मिलाकर देखें तो पांच प्रमुख पोल बीजेपी के पक्ष में हैं, जो पार्टी के लिए पहली बार बंगाल में सरकार बनाने की प्रबल संभावना दिखाते हैं. ‘एक्सिस माय इंडिया’ ने खुद को इस दौड़ से अलग रखा और बताया कि राज्य में लगभग 70% लोगों ने उनके सर्वे में हिस्सा नहीं लिया.
सवाल 2: तो फिर बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने पर सीएम की रेस में कौन हैं?
जवाब: यह सवाल पूरे चुनाव परिणाम का सबसे रोमांचक पहलू है. बीजेपी ने बंगाल में बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे की घोषणा के चुनाव लड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और विकास एजेंडे पर वोट मांगे. लेकिन पार्टी के भीतर इस पद के लिए संभावित दावेदारों की रेस तेज है.
- सुवेंदु अधिकारी: इस दौड़ में सबसे आगे हैं क्योंकि वे खुद को ममता बनर्जी के खिलाफ सबसे आक्रामक और मुखर चेहरे के रूप में स्थापित कर चुके हैं. 2020 में TMC छोड़कर बीजेपी में आए अधिकारी को पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का भी समर्थन मिला है. मई-जून 2025 में गृह मंत्री अमित शाह की कोलकाता यात्रा के दौरान शाह ने सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ की थी, जिसे अधिकारी खेमे ने अपनी बड़ी राजनीतिक पूंजी के रूप में देखा.
- सामिक भट्टाचार्य: बंगाल के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हैं, जो सीधे तौर पर इस रेस में शामिल हैं. भट्टाचार्य को सुकांत मजूमदार की जगह प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था. सुकांत मजूमदार अब केंद्रीय मंत्री हैं. 61 वर्षीय भट्टाचार्य RSS कार्यकर्ता और राज्यसभा सांसद हैं.
- लॉकेट चटर्जी: बीजेपी सांसद और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, एक पूर्व अभिनेत्री और वरिष्ठ नेता के रूप में उनकी पहचान है. बीजेपी उन्हें एक प्रभावशाली महिला चेहरे के रूप में पेश कर सकती है. वे इकलौती बीजेपी की महिला नेता हैं, जिनका नाम सीएम की रेस में उठ रहा है.
- निशीथ प्रमाणिक: एक नया लेकिन उभरता हुआ चेहरा हैं. वे युवा सांसद हैं और एक ऐसे नेता के रूप में देखे जाते हैं जिनकी पार्टी के सभी गुटों में अच्छी पकड़ है. ममता बनर्जी के खिलाफ खड़े होने की उनकी क्षमता और संगठन में उनकी बढ़ती भूमिका उन्हें एक संभावित ‘डार्क हॉर्स’ बनाती है.
सवाल 3: क्या बीजेपी बंगाल में ‘लो-लाइट फेस’ फॉर्मूला दोहरा सकती है?
जवाब: एक्सपर्ट्स बात की पूरी संभावना जताते हैं और कई ठोस राजनीतिक वजहें बताते हैं. बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व अक्सर उन राज्यों में एक ‘सामूहिक नेतृत्व’ और ‘लो-लाइट’ चेहरे को प्राथमिकता देता है जहां पार्टी के भीतर कई मजबूत और महत्वाकांक्षी नेता हों. इस रणनीति का सीधा फायदा यह होता है कि इससे अंदरूनी गुटबाजी और खुली रस्साकशी पर लगाम लगती है और सरकार का संचालन सुचारू रूप से हो पाता है.
बंगाल बीजेपी में सुवेंदु अधिकारी और सामिक भट्टाचार्य के बीच ही नहीं, बल्कि पुराने RSS बैकग्राउंड वाले नेताओं और TMC से आए नेताओं के बीच भी गहरी खींचतान रही है. सुवेंदु अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत उनकी जमीनी पकड़ और जनता के बीच लोकप्रियता है, लेकिन पार्टी के भीतर उनका एक बड़ा विरोधी खेमा भी है. ऐसे में, अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो विरोधी खेमे की नाराजगी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है. दूसरी ओर, सामिक भट्टाचार्य का RSS से गहरा जुड़ाव और संगठन पर पकड़ उन्हें एक सुरक्षित विकल्प बनाती है, लेकिन उनके पास अधिकारी जैसा जनाधार नहीं है.
यही वजह है कि निशीथ प्रमाणिक जैसा युवा और सर्वस्वीकार्य चेहरा या लॉकेट चटर्जी जैसी वरिष्ठ नेता एक ‘समझौता उम्मीदवार’ के रूप में उभर सकते हैं. बिल्कुल वैसे ही जैसे मध्य प्रदेश में मोहन यादव, राजस्थान में भजनलाल शर्मा और छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय के मामले में हुआ था.
सामिक भट्टाचार्य ने कहा था, ‘पार्टी किसी ऑर्गेनिक या इनऑर्गेनिक नेता का भेद नहीं करती और जनता जिसे भी TMC के कुशासन के खिलाफ मजबूत मानेगी, जीत के बाद वही चेहरा हो सकता है.’ ये बयान इसी रणनीति की ओर इशारा करता है. यह केंद्रीय नेतृत्व को यह छूट देता है कि वह नतीजों और आंतरिक संतुलन के हिसाब से किसी भी नाम पर अंतिम मुहर लगा सके.
सवाल 4: 90% के पार मतदान ने चुनावी समीकरणों को कैसे प्रभावित किया?
जवाब: 2026 के इस चुनाव में करीब 90% और कई जगहों पर 92% से अधिक का रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ है. यह आंकड़ा अपने आप में एक बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश है और इसने सभी दलों के दावों और एग्जिट पोल के अनुमानों की असलियत को परखना और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है.
इस भारी मतदान को लेकर दोनों प्रमुख दलों के अपने-अपने दावे हैं. सामिक भट्टाचार्य का कहना है कि इतना ऊंचा मतदान TMC की ‘विभाजनकारी राजनीति’ को पूरी तरह से खारिज करता है. दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और TMC ने इसी उच्च मतदान को अपनी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और जमीनी पकड़ का समर्थन बताया है. ममता बनर्जी ने तो दो-तिहाई बहुमत से जीत का दावा भी कर दिया था, जिस पर पलटवार करते हुए भट्टाचार्य ने तंज कसा कि ‘दीदी 4 मई को जा रही हैं’ और ‘खेला खत्म हो गया है.’