खेल शुरू हुआ, अभी और खेला होगा, क्या ममता संभल लेगी?


पश्चिम बंगाल में आखिरकार सत्ता परिवर्तन हो गया और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने लंबे इंतजार के बाद राज्य में सरकार बना ली. अब मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका औपचारिक ऐलान होना बाकी है. लेकिन असली सवाल सरकार बनने का नहीं, बल्कि यह है कि ममता बनर्जी जैसी लोकप्रिय नेता सत्ता से बाहर कैसे हो गईं. उनकी जनसंपर्क क्षमता और लोकप्रियता पर उनके विरोधी भी सवाल नहीं उठाते, फिर भी वे जमीन क्यों खो बैठीं, यही समझने की जरूरत है.

टीएमसी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

2021 के बाद भाजपा लगातार अभियान मोड में रही और तृणमूल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए. शिक्षक भर्ती घोटाले के मामले में अदालत के जरिए हजारों नौकरियां रद्द हुईं और पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी को जेल भेजा गया. इन घटनाओं ने जनता के बीच सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया. जिन लोगों की नौकरियां गईं, उनमें असंतोष बढ़ा और उन्हें लगा कि सरकार स्थिति संभालने में असफल है.

इसके अलावा, केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत मिलने वाले फंड में भी बाधाएं आईं, जैसे मनरेगा के भुगतान में देरी, जिससे लाखों मजदूर प्रभावित हुए. इसका सीधा असर जनता के गुस्से के रूप में सामने आया. वहीं, ईडी जैसी एजेंसियों की कार्रवाई और नेताओं पर जांच ने तृणमूल की साख को और कमजोर किया, भले ही ठोस सबूत सामने न आए हों. राजनीति में छवि खराब होना कई बार वास्तविक दोष से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाता है.

कार्यकर्ताओं ने की छवि खराब

तृणमूल के कुछ कार्यकर्ताओं पर वसूली और स्थानीय स्तर पर गड़बड़ियों के आरोपों ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया. इसके साथ ही मतदाता सूची के पुनरीक्षण में बड़ी संख्या में नाम कटने का मुद्दा भी सामने आया, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हुए. हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार की सामाजिक योजनाओं, जैसे लक्ष्मी भंडार, की राशि बढ़ाई जाती तो महिला वोटरों का रुझान बदल सकता था.

अब सवाल यह है कि क्या तृणमूल कांग्रेस खत्म हो जाएगी? फिलहाल ऐसा नहीं लगता, लेकिन पार्टी के नेताओं पर दबाव बढ़ेगा और अंदरूनी चुनौतियां सामने आएंगी, खासकर अभिषेक बनर्जी के लिए. आने वाले समय में ममता बनर्जी पार्टी को कैसे संभालती हैं, यह काफी महत्वपूर्ण होगा. अंततः, यह साफ है कि राजनीतिक ‘खेला’ अभी खत्म नहीं हुआ है—यह आगे भी जारी रहेगा और जनता को इसके अगले चरण का इंतजार करना होगा.

[ये लेखक के निजी विचार हैं.]

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