1877 में एल नीनो से 2 करोड़ मौतें और फसलें बर्बाद! 140 साल बाद कैसे दोहराएगा इतिहास, क्या गर्मी से बचने का कोई रास्ता नहीं?

साल 1877… भारत पर ब्रिटिश हुकूमत थी और बंबई प्रेसीडेंसी की गलियों में मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था. तापमान इतना बढ़ गया था कि जमीन फट रही थी. अनाज के दाने सोने के दाम पर मिल रहे थे. ब्रिटिश लाइब्रेरी में संभालकर रखे हुई फेमाइन दस्तावेज बताते हैं कि 1877 में अकेले बंबई प्रेसीडेंसी (महाराष्ट्र और गुजरात) में मरने वालों की संख्या ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. डरावनी बात यह थी कि लोग भूख से नहीं, बल्कि बुखार और दस्त जैसी बीमारियों से मर रहे थे, क्योंकि गर्मी ने पानी के कुओं और तालाबों को सुखा दिया था. कुपोषण शरीर को बीमारियों के खिलाफ लड़ने लायक ही नहीं छोड़ रहा था. तब दुनिया ने सीखा था कि जब एल नीनो आता है, तो भारत में तबाही मच जाती है. अब साल 2026 है और 1877 से बड़ा एल नीनो फिर से आ रहा है…

सवाल 1: 1877 में गर्मी ने कितनी तबाही मचाई थी और क्या वाकई 2 करोड़ लोग मारे गए थे?

जवाब: अमेरिकी मौसम विभाग नेशनल ओशियनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) की रिपोर्ट के मुताबिक, 1876-77 में प्रशांत महासागर में भीषण एल नीनो आया था. इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ गया था. बारिश नहीं हुई, खेत सूख गए, अनाज पैदा नहीं हुआ. भारत में अकाल था, लेकिन अंग्रेजों ने अनाज निर्यात जारी रखा. 1877 में जहां भारत के लोग भूखों मर रहे थे, वहीं इंग्लैंड के लिए 3.2 लाख टन गेहूं भेजा गया. ब्रिटिश सरकार ने राहत कार्यों में भी ढिलाई बरती. रिपोर्ट्स के मुताबिक, राहत कैंपों में हालात इतने खराब थे कि वहां भी लोग मर रहे थे.

 

1877 में ग्रेट फेमाइन के दौरान कुपोषण से पीड़ित परिवार
1877 में ग्रेट फेमाइन के दौरान कुपोषण से पीड़ित परिवार

NOAA की जरनल ऑफ क्लाइमेट रिपोर्ट 2018 के मुताबिक, भारत में 1.22 करोड़ से 2.93 करोड़ मौतें हुईं थीं. उस दौरान भीषण गर्मी, सूखा और फसल बर्बादी के चलते दुनिया की करीब 4% आबादी खत्म हो गई थी. बॉम्बे प्रेसीडेंसी (महाराष्ट्र और गुजरात) में अकेले 1877 में 4,86,302 मौतें दर्ज की गईं थीं. 1877-78 के अकाल का असर:

  • 6,70,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित हुआ.
  • कुल 5.85 करोड़ (58.5 मिलियन) लोग अकाल की चपेट में आए.
  • मद्रास, मैसूर, हैदराबाद और बंबई पूरी तरह तबाह हो गया.
  • इस त्रासदी के बाद ही 1880 में पहली बार ‘फैमिन कोड’ (अकाल कोड) बनाया गया.

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अब 2026 में फिर से एल नीनो बन रहा है, जो 1877 से भी ज्यादा खतरनाक होगा. यह एल नीनो बीते 140 सालों में सबसे भयंकर तबाही ला सकता है.

सवाल 2: क्या वाकई 2026 बीते 140 सालों में सबसे ज्यादा गर्म रहेगा?

जवाब: हां, वैज्ञानिकों का मानना है कि 2026 में ऐतिहासिक गर्मी पड़ने के आसार हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है सुपर एल नीनो. NOAA के मुताबिक, एल नीनो के जून-अगस्त 2026 के बीच आने की 62% संभावना है, जो आने वाले महीनों में 80% से ऊपर जा सकती है . यह एल नीनो ‘सुपर’ कैटेगरी का हो सकता है, जिसका मतलब है कि प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा.

जब एल नीनो आता है, तो भारत में गर्मी ज्यादा पड़ती है और मानसून कमजोर रहता है. यही वजह है कि इंटरगवर्नमेंटल पेनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्ट के लेखक अंजल प्रकाश ने चेतावनी दी है कि 40 डिग्री भी 50 डिग्री जैसी लग सकती है, अगर नमी (ह्यूमिडिटी) ज्यादा हो.

 

प्रशांत महासागर में बनता सुपर एल नीनो
प्रशांत महासागर में बनता सुपर एल नीनो

अभी अप्रैल 2026 चल रहा है, इसलिए पूरा साल का फैसला नहीं हुआ है. लेकिन कार्बन ब्रीफ, NOAA, NASA, कॉपरनिकस और बार्कले अर्थ जैसे संगठनों के डेटा से पता चलता है कि 2026 बीते 140 सालों में सबसे ज्यादा गर्म रहेगा. कई अनुमानों में यह दूसरा सबसे गर्म साल बन सकता है. 2024 अभी तक का सबसे गर्म साल माना जाता है, उसके बाद 2023 और 2025.

2026 में मजबूत एल नीनो की संभावना है, जो ग्लोबल तापमान को और बढ़ा सकता है. जनवरी-मार्च 2026 का औसत तापमान रिकॉर्ड में चौथा सबसे गर्म रहा. मार्च 2026 दूसरा या चौथा सबसे गर्म महीना रहा. पूरी तरह से 140 साल (1880 से) में सबसे गर्म साल बनेगा या नहीं, यह मई-जून के बाद साफ होगा, लेकिन शुरुआत ही बहुत गर्म है.

सवाल 3: भारत में इन दिनों गर्मी का आलम क्या है?

जवाब: भारत में गर्मी ने अप्रैल में ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. 27 अप्रैल 2027 को:

उत्तर प्रदेश- सबसे ज्यादा प्रभावित

  • बांदा: 47.4 डिग्री सेल्सियस (देश का सबसे गर्म शहर)
  • प्रयागराज: 45.7 डिग्री सेल्सियस
  • वाराणसी: 44 डिग्री सेल्सियस 

उत्तर प्रदेश के 50 से ज्यादा जिलों में हीटवेव का अलर्ट है. पूर्वी UP के 15 जिलों- बांदा, चित्रकूट, कौशांबी, प्रयागराज, फतेहपुर, प्रतापगढ़, मिर्जापुर, वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया में भीषण लू की चेतावनी है.

मध्य प्रदेश: 8वीं तक स्कूलों की छुट्टी

  • भोपाल: 42.4 डिग्री सेल्सियस (सामान्य से 3.2 डिग्री सेल्सियस अधिक)
  • खजुराहो और रतलाम: 45 डिग्री सेल्सियस

भीषण गर्मी की वजह से भोपाल, इंदौर और ग्वालियर समेत कई शहरों के सभी स्कूलों में 30 अप्रैल तक 8वीं कक्षा तक की छुट्टी घोषित कर दी है.

राजस्थान, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा: हीटवेव और हीटस्ट्रोक का प्रकोप

  • दिल्ली: 42.1 डिग्री सेल्सियस (27 अप्रैल) और 28 अप्रैल को 44 डिग्री सेल्सियस तक जाने की संभावना
  • नारनौल (हरियाणा): 44.2 डिग्री सेल्सियस
  • बठिंडा (पंजाब): 43.7 डिग्री सेल्सियस

दिल्ली की CM रेखा गुप्ता ने हीट वेव से निपटने के लिए बस स्टॉप पर कूल रूफ, मिस्टिंग सिस्टम, स्कूली बच्चों के लिए ORS, कंस्ट्रक्शन वर्कर्स के लिए राहत की घोषणा की है. वाराणसी के अस्पतालों में हीटस्ट्रोक यूनिट और बाथटब तक लगा दिए हैं.

इसके अलावा 26 अप्रैल 2026 को देश की पीक पावर डिमांड 256.11 गीगावॉट रिकॉर्ड की गई, जो एक दिन पहले के 252.07 गीगावॉट के रिकॉर्ड को भी तोड़ गई. एसी, कूलर और पंखों की वजह से बिजली की खपत भी रिकॉर्ड तोड़ रही है.

 

बीकानेर में सड़क पर प्यास बुझाता एक बुजुर्ग
बीकानेर में सड़क पर प्यास बुझाता एक बुजुर्ग

सवाल 4: 2026 में 1877 से ज्यादा भयंकर गर्मी क्यों पड़ रही है?

जवाब: भारतीय मौसम विभाग (IMD) और NOAA भीषण गर्मी की 6 बड़ी वजहें बताते हैं:

  1. वेट-बल्ब टेंपरेचर का खतरा: 1877 में लोग धूप से बचने के लिए पेड़ों के नीचे बैठ जाते थे. आज शहरों में कंक्रीट के जंगल हैं, लेकिन असली खतरा नमी है. जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के साथ ज्यादा नमी हो, तो पसीना नहीं सूखता. शरीर खुद को ठंडा नहीं रख पाता. 3-4 घंटे में हार्ट अटैक और ऑर्गन फेल्योर से मौत हो सकती है.
  2. हीट डोम: राजस्थान, UP और MP जैसे प्रदेशों में आसमान में एक हाई-प्रेशर सिस्टम बना हुआ है. यह एक गुंबद की तरह काम करता है. गर्म हवा को ऊपर जाने से रोकता है और नीचे दबाकर और गर्म कर देता है. इससे बादल नहीं बन पाते और धूप सीधी जमान पर पड़ती है. यही वजह है कि लगातार कई दिनों तक तापमान 44-45 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है.
  3. शहरी हीट आइलैंड इफेक्ट: 1877 में शहर छोटे थे. आज दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में कंक्रीट, डामर और एसी से निकलने वाली गर्मी ने तापमान और बढ़ा दिया है. रात में भी शहर ठंडे नहीं हो रहे हैं. रात की लू भी चलने लगी है.
  4. बढ़ती आबादी और अव्यवस्था: 1877 में भारत की आबादी करीब 25 करोड़ थी. आज 140 करोड़ से ज्यादा है. ज्यादा लोग यानी ज्यादा जानें खतरे में. भारत में हीट एक्शन प्लान तो हैं, लेकिन गरीब, किसान, मजदूर और बच्चे सुरक्षित नहीं हैं.
  5. बिजली पर निर्भरता: 1877 में गर्मी से बचने के लिए पंखे तक नहीं थे. आज बिजली नहीं तो एसी और पंखे नहीं चलेंगे, लेकिन इतनी बिजली की मांग संभालना मुश्किल है. 2026 का पावर डिमांड रिकॉर्ड (252 GW) चेतावनी है कि हम बिजली संकट के कगार पर हैं. भारत में आज भी 70% बिजली कोयले से बनती है, जो क्लाइमेट चेंज की बड़ी वजह है.
  6. मानसून फेल होने का खतरा: एल नीनो आम तौर पर मानसून को कमजोर करता है. 2023 एल नीनो साल में भारत में सामान्य से कम बारिश हुई थी. 2026 में भी यही हो सकता है, यानी कम बारिश, सूखा, फसल बर्बाद, और फिर महंगाई और अकाल जैसे हालात.

इसके अलावा एल नीनो का खतरा तो बना हुआ है. 

सवाल 5: आखिर गर्मी से राहत कब और कैसे मिलेगी?

जवाब: 2026 के बाकी गर्मियों में ही IMD की चेतावनी है कि पूर्वी, मध्य, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय इलाकों में सामान्य से ज्यादा हीटवेव वाले दिन रहेंगे. अप्रैल-जून 2026 में तटीय क्षेत्रों में हॉट एंड ह्यूमिड मौसम जारी रहेगा. मानसून के दौरान नमी और बढ़ेगी, जिससे उत्तरी भारत में नमी वाली लू की आशंका 125% तक बढ़ सकती है. इससे बचने के लिए 6 स्टेप्स फॉलो करें:

  • समय का ध्यान रखें: दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक बाहर बिल्कुल कम निकलें. अगर काम करना ही पड़े तो बार-बार छाया में 10-15 मिनट आराम करें.
  • पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स: दिन भर में ढेर सारा पानी पिएं. ORS, नमक-चीनी का घोल, नींबू पानी, नारियल पानी या दही-लस्सी लें. आपका यूरीन हल्का पीला होना चाहिए, अगर गहरा हो तो समझ लें पानी कम हो रहा है.
  • कपड़ों का चुनाव: ढीले, सूती, हल्के रंग के कपड़े पहनें. काले या सिंथेटिक कपड़े न पहनें क्योंकि वे गर्मी सोख लेते हैं. सिर पर टोपी, गमछा या छाता जरूर रखें.
  • घर को ठंडा रखें: पर्दे बंद रखें, पंखा और कूलर चलाएं. रात में खिड़कियां खोलकर हवा आने दें. अगर AC है तो 24-26 डिग्री पर रखें.
  • लक्षणों पर नजर: थकान, चक्कर आना, ज्यादा पसीना न आना, तेज बुखार, उल्टी, मांसपेशियों में दर्द और बेहोशी खतरे के संकेत हैं. ऐसा होने पर तुरंत ठंडी जगह पर जाएं, पानी पिएं और डॉक्टर को दिखाएं.
  • खास लोगों की देखभाल: बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं, हाई बीपी या डायबिटीज वाले और खुले में काम करने वाले मजदूर सबसे ज्यादा जोखिम में हैं. घर में वेंटिलेशन अच्छा रखें और रोज चेक करें.

यह राहत अस्थायी है. मई-जून में जब एल नीनो पूरी तरह आएगा, तो फिर से तापमान बढ़ सकता है. सबसे बड़ी चिंता एल नीनो के बाद शुरू होगी, अगर इस बार कमजोर मानसून रहा तो न सिर्फ गर्मी बढ़ेगी, बल्कि सूखे और अकाल का खतरा भी मंडराने लगेगा.

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