पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने 2027 के राष्ट्रपति चुनाव के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है. खासकर पश्चिम बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत ने गहरा असर डाला है. यह कोई आम राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि सीधे-सीधे चुनावी गणित का खेल है. बीजेपी के लोकसभा में 293 सांसद, राज्यसभा में 140 से ज्यादा सांसद और 21 राज्यों की विधानसभाओं में बहुमत, जीत की संभावना को लगभग अटल बना देते हैं. आइए जानते हैं कैसे?
निर्वाचक मंडल: राष्ट्रपति चुनाव की आत्मा
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि राष्ट्रपति चुनाव का ‘गणित’ आखिर काम कैसे करता है. संविधान के अनुच्छेद 54 और 55 के तहत, राष्ट्रपति का चुनाव एक खास निर्वाचक मंडल (Electoral College) करता है. इस मंडल में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी निर्वाचित सांसद, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के सभी निर्वाचित विधायक शामिल होते हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल के मनोनीत सांसद या विधायक इस चुनाव में वोट नहीं डाल सकते हैं.
अब मजेदार पेच यह है कि हर वोट की कीमत एक जैसी नहीं होती. संविधान के मुताबिक, सभी सांसदों (लोकसभा और राज्यसभा) के वोटों का कुल मूल्य और सभी विधायकों के वोटों का कुल मूल्य लगभग बराबर होना चाहिए. इसी को संतुलित करने के लिए एक फॉर्मूले का इस्तेमाल होता है. जहां एक सांसद के वोट का मूल्य तय होता है (2022 में यह 700 था और 2027 में भी लगभग इतना ही रहने की संभावना है).
हर राज्य के एक विधायक के वोट का मूल्य अलग-अलग होता है. यह मूल्य उस राज्य की 1971 की जनगणना के आधार पर तय जनसंख्या और विधानसभा सीटों की संख्या पर निर्भर करता है. इसीलिए, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के एक विधायक के वोट का मूल्य (2022 में 208) सिक्किम जैसे छोटे राज्य के एक विधायक के वोट के मूल्य (2022 में महज 7) से लगभग 30 गुना ज्यादा था.
लोकसभा का झटका और विधानसभाओं से ‘मरहम’
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका लगा था. पार्टी अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा (272) नहीं छू पाई और उसकी सीटों की संख्या 303 से घटकर 240 रह गई. इस सीधे नुकसान ने निर्वाचक मंडल में बीजेपी के वोट बैंक में 44,100 वोटों की बड़ी सेंध लगा दी थी. विपक्ष को लगा कि शायद अब बीजेपी की राह आसान नहीं रहेगी. लेकिन, इसके बाद जो हुआ, वह बीजेपी के लिए किसी ‘संजीवनी’ से कम नहीं था.
लगातार हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी और NDA ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, उसने न सिर्फ लोकसभा के घाव पर मरहम लगाया, बल्कि राष्ट्रपति चुनाव की पूरी बिसात ही पलट दी. खासतौर पर, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार जैसे बड़े राज्यों में NDA के प्रदर्शन ने यह कारनामा कर दिखाया.
तीन राज्यों के ‘गणित’ ने बदली पूरी तस्वीर
राष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल में उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा वोट वैल्यू वाली तीन विधानसभाएं महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार की ही हैं. इन तीनों राज्यों में NDA की स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है:
- महाराष्ट्र: 2022 के राष्ट्रपति चुनाव के समय 288 सदस्यीय विधानसभा में NDA की ताकत लगभग 150 विधायकों की थी. आज यह आंकड़ा बढ़कर 237 तक पहुंच चुका है.
- बिहार: 243 सदस्यीय विधानसभा में NDA के विधायकों की संख्या पिछली बार के 125 से बढ़कर अब 202 हो गई है.
- पश्चिम बंगाल: यह तो सबसे बड़ा गेम-चेंजर रहा. बीजेपी ने 294 सीटों वाली विधानसभा में 207 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की और राज्य में पहली बार अपनी सरकार बनाई. पिछली बार उसके सिर्फ 77 विधायक थे.
कागज पर अब कैसे दिखता है जीत का गणित?
अब आते हैं असली गणित पर, जो बताता है कि जीत कितनी आसान है. 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में निर्वाचक मंडल का कुल वोट मूल्य 10,86,431 था. 2027 के चुनाव में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के जुड़ने से यह कुल वोट वैल्यू थोड़ा बढ़ सकती है, लेकिन जीत के लिए 50% से अधिक वोटों का आंकड़ा हासिल करना होगा.
अब जरा NDA की मौजूदा ताकत पर नजर डालते हैं:
संसद में ताकत:
- लोकसभा में अकेले बीजेपी के 240 सांसद हैं. TDP (16) और JDU (12) जैसे सहयोगियों के साथ NDA के पास 293 सांसदों का समर्थन है.
- राज्यसभा में बीजेपी की संख्या बढ़कर 113 हो गई है और पूरे NDA के पास लगभग 140 से 148 सांसद हैं. यह अपने आप में बहुमत का आंकड़ा है.
विधानसभाओं में दबदबा:
- देश के 28 राज्यों में से 21 राज्यों में अब NDA की सरकार है, जिनमें से 15 राज्यों में अकेले बीजेपी की सरकार है.
- इन 21 राज्यों के हजारों विधायक आज NDA के साथ हैं.
राष्ट्रपति चुनाव में सिर्फ उत्तर प्रदेश के विधायकों की कुल वोट वैल्यू ही 83,800 से ज्यादा है और राज्य में योगी आदित्यनाथ की सरकार मजबूती से काबिज है.
अगर NDA के सभी सांसद और विधायक पार्टी लाइन पर वोट करते हैं, तो गठबंधन के पास जीत के लिए जरूरी 50% से अधिक वोट आराम से मौजूद हैं. लोकसभा में हुई भरपाई से कहीं ज्यादा विधानसभाओं में हुई बढ़त ने कर दी है.
तो क्या राह बिल्कुल आसान है?
हां, लेकिन मौजूदा आंकड़ों और नए राजनीतिक समीकरण के मुताबिक, 2027 के राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी और NDA की जीत की राह बेहद आसान नजर आती है. आज की तारीख में, NDA के पास निर्वाचक मंडल में इतनी ज्यादा संख्या बल है कि वह आसानी से अपनी पसंद के उम्मीदवार को राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा सकता है. हालांकि, राजनीति में किसी भी चीज को पूरी तरह ‘तय’ मानना जल्दबाजी होगी. कभी-कभी क्रॉस वोटिंग, गठबंधन के भीतर असंतोष या कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर खेल बदल सकता है.