आदिवासियों पर थाना साफ करने जैसी जमानत शर्तें लगाने को लेकर भड़के CJI, बोले- आजादी के 76 साल बाद भी…

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर पुलिस थानों की सफाई करने जैसी अपमानजनक शर्तें लगाए जाने को लेकर सोमवार (4 मई, 2026)) को ओडिशा की अदालतों की कड़ी आलोचना की. अदालत ने उड़ीसा हाईकोर्ट की ओर से लगाई गई और सत्र अदालत द्वारा बरकरार रखी गई इस तरह की अपमानजनक जमानत शर्तों को अमान्य करार दिया.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने देश की सभी अदालतों से भविष्य में इस तरह की शर्तें लागू करने से परहेज करने का आग्रह किया. बेंच ने कहा कि ये आदेश गहरी जड़ें जमा चुकी जाति-आधारित पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं जो जातिविहीन समाज के संवैधानिक संकल्प को कमजोर करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा हाईकोर्ट और राज्य की जिला अदालतों द्वारा लगाए गए जमानत की शर्तों का स्वतः संज्ञान लिया था. ये शर्तें उस मामले से संबंधित थीं, जिसमें आदिवासी और दलित समुदायों के सदस्यों को एक कॉरपोरेट कंपनी द्वारा भूमि अधिग्रहण किए जाने के विरोध में प्रदर्शन करने के बाद हिरासत में लिया गया था.

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इन शर्तों के तहत, मुख्य रूप से दलित और आदिवासी समुदायों से संबंधित आरोपियों को कई महीनों तक पुलिस थानों की साफ-सफाई करनी पड़ती. इन आदेशों पर निराशा और दुख व्यक्त करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश की आजादी के 76 साल बाद, ऐसी शर्तें लगाई जा रही हैं.

उन्होंने कहा, ‘दुर्भाग्यवश, ओडिशा में हाईकोर्ट और कुछ जिला अदालतें जमानत देते समय ऐसी शर्तें लगा रहे हैं जो न्यायपालिका की छवि को धूमिल करती हैं.’ बेंच ने एक विशिष्ट मामले के तथ्यों पर गौर किया, जिसमें 40 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया था और उनमें से कुछ को उड़ीसा हाईकोर्ट से जमानत मिली थी. पीठ ने गौर किया कि दो महीने तक पुलिस थानों की सफाई करने जैसी अभूतपूर्व शर्तें लगाई गई थीं.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘एक अन्य आदेश में हाईकोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को जमानत देते हुए, इसी तरह का एक आदेश पारित किया था…… इससे न्यायपालिका का पूर्वाग्रह उजागर होता है क्योंकि आरोपी हाशिये पर मौजूद समुदाय से हैं.’

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बेंच ने स्पष्ट किया कि अमीर प्रतिवादियों पर ऐसी शर्तें नहीं लगाई गईं. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की न्यायपालिका द्वारा प्रदर्शित प्रतिगामी मानसिकता पर अपनी गहरी निराशा व्यक्त की. बेंच ने कहा, ‘हम राज्य न्यायपालिका द्वारा लगाई गई ऐसी सभी शर्तों और इसी तरह की अन्य सभी शर्तों को अमान्य घोषित करते हैं. याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय से तत्काल ऐसी शर्तों को हटाने का अनुरोध करें और उनके स्थान पर कोई अन्य समान शर्त न लगाएं.’ बेंच ने आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी जमानत पर ही रहेंगे.

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को देश भर के सभी उच्च न्यायालयों को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश भी दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हर हाईकोर्ट यह सुनिश्चित करेगा कि इस आदेश की एक प्रति उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले प्रत्येक न्यायिक अधिकारी को भेजी जाए. साथ ही यह सूचना भी दी जाए कि जमानत देते समय ऐसी शर्तें नहीं लगाई जाएंगी.’ बेंच ने उड़ीसा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को चार सप्ताह के भीतर आदेश का पालन करने को कहा.

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