भारतीय राजनीति के कालखंड में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो इतिहास की दिशा बदल देते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी ने जब से भारत की गद्दी संभाली है, तब से आज तक ऐसे क्षण थोक के भाव में दिन प्रतिदिन आ रहे हैं. पीएम मोदी का भारत और भारतीय प्रथम रोजाना पुष्पित पल्लवित हो रहा है. सबका साथ सबका विकास, सुशासन, साफगोई व पारदर्शिता इन सभी ने मिलकर आज जब पश्चिम बंगाल की विधानसभा और दक्षिण भारत के चुनावी नतीजे पटल पर उभरे हैं तो यह साफ कर दिया है कि यह महज एक ‘सत्ता परिवर्तन’ नहीं है. यह उन करोड़ों दबे-कुचले स्वाभिमानों की हुंकार है, जिन्हें दशकों से ‘वोट बैंक’ की राजनीति की वेदी पर बलि चढ़ाया जा रहा था.
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलने वाली आंधी ने आज अपना परचम जिस तरह से लहराया है, उससे हमें डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की याद आने स्वाभाविक है. डॉ मुखर्जी ने जिस बंगाल की माटी से ‘एक राष्ट्र, एक विधान’ का संकल्प लिया था, आज उसी माटी ने उनके विचारों की सरकार को लगभग दो-तिहाई बहुमत देकर नियति का चक्र पूरा कर दिया है.
इस ऐतिहासिक जनादेश की नींव केवल विकास के वादों पर नहीं, बल्कि उस सुरक्षा बोध पर टिकी है, जो पिछले एक वर्ष में गंभीर खतरे में था. लगभग दो साल पहले पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद वहां जो-जो घटा, उसे बंगाल का हिंदू कभी नहीं भूल सकता. पड़ोसी देश बांग्लादेश में जिस तरह तख्तापलट हुआ और शेख हसीना को जान बचाकर भागना पड़ा, उसने सरहद के इस पार रहने वाले बंगाली समाज की रूह कंपा दी थी. ‘शांति के दूत’ कहे जाने वाले नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के सत्ता संभालते ही वहां जो तांडव शुरू हुआ, उसने भारत में भी छद्म धर्मनिरपेक्षता का नकाब उतार फेंका.
वहां के प्रसिद्ध लोक संगीतकार राहुल आनंद का 140 साल पुराना घर जलाया जाना महज एक घटना नहीं, बल्कि एक संस्कृति को मिटाने का प्रयास था. जब उनके हाथों से बने वाद्ययंत्रों को आग के हवाले किया गया, तो उसकी तपिश पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया के जिलों में महसूस की गई. इस्कॉन के संतों की गिरफ्तारी और हिंदुओं के नरसंहार पर जब भारत का ‘सेक्युलर जमात’ और ममता बनर्जी का प्रशासन मौन साधे बैठा था, तब बंगाल का सामान्य हिंदू यह समझ गया कि यदि आज वह नहीं जागा, तो कल उसकी स्थिति भी वही होगी. मतदान केंद्रों पर लगी लंबी कतारें इसी ‘अस्तित्व की लड़ाई’ का परिणाम थीं. हिंदुओं ने इस बार ‘चुपचाप कमल छाप’ का मंत्र नहीं, बल्कि ‘खुलकर अधिकार’ की नीति अपनाई.
ममता दीदी की ‘इमाम भत्ता’ से लेकर ‘मजहबी विशेषीकरण’ की राजनीति ने बंगाल के मूल स्वरूप को हाशिए पर धकेल दिया था. ‘जय श्री राम’ के उद्घोष पर जेल भेजने वाली मानसिकता को आज जनता ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाकर यह सिद्ध कर दिया है कि बंगाल अब ‘संदेशखाली’ जैसी घटनाओं को और बर्दाश्त नहीं करेगा. महिलाओं के साथ हुए अनाचार और स्थानीय स्तर पर तृणमूल के ‘सिंडिकेट राज’ ने जो आक्रोश पैदा किया था, उसे बांग्लादेश के घटनाक्रम ने एक ज्वलंत आग में बदल दिया. आज का परिणाम उसी सामूहिक चेतना का प्रतिफल है.
बंगाल की यह लहर दक्षिण की ओर भी उतनी ही तीव्रता से बढ़ी. तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन और उनके पुत्र उदयनिधि स्टालिन की हार भारतीय राजनीति का सबसे सुखद संकेत है. जिन लोगों ने सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू’ और ‘मलेरिया’ से की थी और इसे मिटाने की कसमें खाई थीं, उन्हें तमिलनाडु की ईश्वर-भक्त जनता ने अपनी शक्ति दिखा दी है. द्रविड़ राजनीति के नाम पर हिंदू संस्कृति का अपमान अब राज्य में स्वीकार्य नहीं है. भाजपा ने वहां न केवल अपना जनाधार बढ़ाया, बल्कि स्टालिन के अभेद्य किले को ढहाकर यह साबित कर दिया कि ‘मुरुगन’ की धरती अधर्मियों के साथ नहीं खड़ी होगी.
असम में भाजपा की प्रचंड जीत ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ‘घुसपैठ मुक्त असम’ की नीति पर मुहर लगा दी है. असम के मूल निवासियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी जनसांख्यिकी और संस्कृति से खिलवाड़ नहीं होने देंगे. वहीं, पुडुचेरी जैसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश में भाजपा का सरकार बनाना यह दर्शाता है कि कमल अब भारत के हर कोने में खिलने के लिए तैयार है. यह केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण तक एक वैचारिक एकीकरण और सनातन का शंखनाद है. इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अब ‘हिंदू’ रक्षात्मक नहीं, बल्कि मुखर है. वह अपनी पहचान को लेकर शर्मिंदा नहीं, बल्कि गौरवान्वित है. वह विकास भी चाहता है और अपनी विरासत की सुरक्षा भी. विपक्षी दलों के लिए यह सबक है कि आप बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को कुचलकर सत्ता की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते.
आज जब कोलकाता की सड़कों पर शंख बज रहे हैं, तो यह उस नए युग की शुरुआत है,जहां तुष्टीकरण का कोई स्थान नहीं होगा. पश्चिम बंगाल ने डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि दी है. अब चुनौती है इस दो-तिहाई बहुमत के साथ बंगाल को फिर से ‘सोनार बांग्ला’ बनाने की, जहाँ कानून का राज हो, न कि कट्टरपंथियों का. यह विजय लोकतंत्र के पर्व में ‘धर्म’ की स्थापना है. यह उन शहीदों को नमन है जिन्होंने बंगाल की अस्मिता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. आज का सूर्योदय एक नए भारत, एक समर्थ भारत और एक सनातनी भारत का उदय है.
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