सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को जल्द सुनवाई के लिए लगाएगा. यह सुनवाई अप्रैल के बाद हो सकती है. मामले के पक्षकारों की तरफ से जल्द सुनवाई का अनुरोध करने पर कोर्ट ने यह आश्वासन दिया. पक्षकारों ने कोर्ट का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था कि उसने 2022 में ही सुनवाई के सवाल तय कर लिए थे.
क्या है मामला?
1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट कहता है कि देश के हर धार्मिक स्थल की जो स्थिति 15 अगस्त 1947 को थी, उसे बदला नहीं जा सकता. इस कानून को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई हैं. इन याचिकाओं में कहा गया है कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध समुदाय को अपना अधिकार मांगने से वंचित करता है. किसी भी मसले को कोर्ट तक लेकर आना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है.
एक्ट के समर्थन में भी कई याचिकाएं
प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का समर्थन करते हुए सुन्नी मुस्लिम उलेमाओं के संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद ने भी 2020 में ही याचिका दाखिल कर दी थी. जमीयत का कहना है कि अयोध्या विवाद के अलावा बाकी मामलों में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का पालन हो, यह सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था इसलिए, अब इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए. जमीयत के अलावा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, कांग्रेस, असदुद्दीन ओवैसी, आरजेडी सांसद मनोज झा, एनसीपी नेता जितेंद्र आव्हाड, सीपीएम नेता प्रकाश करात समेत कई लोगों ने याचिकाएं दाखिल कर मांग की है कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट खारिज कर दे. उन्होंने कहा है कि यह कानून भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के मुताबिक है.
प्रभावी आदेश जारी करने पर है रोक
12 दिसंबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में धार्मिक स्थलों को लेकर नए मुकदमे दर्ज करने पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने कहा था कि जो मुकदमे लंबित हैं, उनमें सुनवाई जारी रह सकती है, लेकिन निचली अदालतें कोई भी प्रभावी या अंतिम आदेश न दें. निचली अदालतें फिलहाल सर्वे का भी आदेश न दें. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के पक्ष और विपक्ष में दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया था.
अजमेर को लेकर दाखिल याचिका नहीं सुनी
बुधवार, 18 फरवरी को हुई सुनवाई में अजमेर दरगाह को लेकर एक याचिका भी सुनवाई के लिए लगी थी, लेकिन चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इसे सुनने से मना कर दिया. याचिकाकर्ता ने अजमेर दरगाह के हिंदू मंदिर होने के दावे को लेकर चल रहे मुकदमे का विरोध किया था. उसका कहना था कि निचली अदालत की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जारी आदेश के विपरीत है.
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए सुनवाई से मना कर दिया कि याचिकाकर्ता अजमेर के सिविल जज के यहां चल रहे मुकदमे में पक्षकार नहीं है. जजों ने यह भी कहा कि सिर्फ एक मुकदमे पर निचली अदालत के जज की तरफ से नोटिस जारी कर देना कोई बड़ी बात नहीं लगती है. उन्होंने किसी तरह का प्रभावी आदेश नहीं दिया है. हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि अगर उसके आदेशों के विपरीत देश की किसी भी कोर्ट से आदेश आएगा, तो वह उसे देखेगा और उचित कार्रवाई करेगा.