भारत में वामपंथ का अंतिम लाल सूरज केरल में केरल में हार के साथ ही अस्त हो गया है. यहां जनता ने यूडीएफ को राज्य का नेतृत्व सौंपा है. इस हार के साथ ही कम्युनिस्ट अब देश में कहीं भी सत्ता में नहीं हैं. वामपंथ के पास भविष्य में अब अस्तित्व बचाने की लड़ाई शेष रह गई है. केरल में इस बार कांग्रेस ने लेफ्ट के गढ़ में सेंध लगाई है. इनमें मुख्य रूप से कन्नूर और पलक्कड़ जिले हैं. आजाद भारत में यह पहली बार होगा, जब भारत के किसी भी राज्य में वामपंथ की सरकार नहीं होगी. वामपंथ के हाथ से पहले त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल निकल चुके हैं.
कभी पश्चिम बंगाल में रहा था वामपंथ का ऐतिहासिक युग
पश्चिम बंगाल में वामपंथ का ऐतिहासिक युग रहा है. लेकिन वो भी कई साल पहले खत्म हो चुका है. 1977 से 2011 तक यहां वामपंथियों की सरकार रही. 34 साल तक वामपंथ ने राज्य का शासन चलाया. यह देश में किसी भी पार्टी की सबसे ज्यादा साल तक रहने वाली सरकार रही. 2011 में ममता बनर्जी ने इस किले को ध्वस्त कर दिया. आज बंगाल में वामपंथ पूरी तरह से खत्म हो चुकी है. यहां पार्टी का एक भी विधायक नहीं है.
त्रिपुरा में 25 साल सत्ता में रहने के बाद हुए बेदखल
वहीं, त्रिपुरा की बात करें, तो लेफ्ट का रहा. यहां 1993 से 2018 तक वामपंथी सत्ता में रहे. 2018 में बीजेपी ने वामपंथियों को सत्ता से बेदखल किया. 2023 में भी बीजेपी ने यहां जीत हासिल की. इससे त्रिपुरा की सत्ता भी वामपंथ से दूर होती चली गई.
केरल के परिणाम ने वामपंथ के अस्तित्व को मिटाया
हालांकि, केरल में इस बार वामपंथ का सफाया माना जा रहा था, क्योंकि पार्टी 10 साल से राज्य की सत्ता पर काबिज थी. यहां की जनता यूडीएफ या फिर एलडीएफ की ही सरकार चुनती रही है. 2021 में जरूर वामपंथ ने वापसी कर चौंकाया था. यहां 50 साल बाद सत्ताधारी पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रही थी.
पूरे देश में लेफ्ट का एक सांसद
केरल एकमात्र ऐसा राज्य था, जहां वामपंथ सत्ता में बचा हुआ था. लेफ्ट की इस हार का असर केंद्र की राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा. सीपीएम और सीपीआई अपनी कम सीटों के बाद भी राजनीति में प्रभाव रखते आ रहे हैं. उसके पास बंगाल, त्रिपुरा और केरल जैसे राज्यों की ताकत थी. लेकिन अब कुल मिलाकर लेफ्ट की सरकार इन राज्यों में भी नहीं बची है. उनके पास सिर्फ एक सांसद बचा है. यह सोचने वाली बात होगी, कभी पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बाद देश की दूसरे नंबर की पार्टी रही वामपंथ को देश की जनता ने फिलहाल सिरे से खारिज कर दिया है. ऐसा कई दशकों बाद संभव हो सका है.
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