पश्चिम बंगाल चुनाव में अगर 2021 जैसा दोहराव होता है, तो यह बीजेपी के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक झटका होगा. 2021 में कई एग्जिट पोल्स में बीजेपी को सत्ता के करीब दिखाया था. ‘चाणक्य’ ने बीजेपी को 97 से 119 सीटें दी थीं, जबकि ‘जन की बात’ ने तो बीजेपी को 162 से 185 सीटें दीं. लेकिन 2 मई 2021 को असली नतीजे आए, तो TMC ने 215 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया, जबकि बीजेपी महज 77 सीटों पर सिमट गई. अगर 2026 में भी यही हाल हुआ तो बीजेपी की हार कितनी बड़ी होगी और 2027 के चुनावों पर क्या असर पड़ेगा? जानेंगे एक्सप्लेनर में…
सबसे पहले जानते हैं कि बीजेपी ने बंगाल में किस तरह जान फूंक दी…
अमित शाह ने बंगाल में रातों को मैराथॉन बैठकें कीं
अमित शाह ने 2026 के बंगाल चुनाव के लिए एक बिल्कुल नई और बेहद गोपनीय रणनीति तैयार की, जिसे ‘साइलेंट मिशन’ या ‘3 AM ब्लूप्रिंट’ का नाम दिया गया. यह रणनीति 2021 की उस रणनीति से बिल्कुल अलग थी, जब पार्टी ने केवल बड़ी रैलियों और ध्रुवीकरण के सहारे चुनाव लड़ा था. इस बार शाह ने दिन में रैलियां और रोड शो करने के साथ-साथ रात के अंधेरे में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को पूरी तरह से दुरुस्त करने का काम किया. देर रात 2 से 3 बजे तक मैराथन बैठकें कीं और अपनी टीम के साथ सभी 44,376 पोलिंग स्टेशनों का डेटा विश्लेषण किया. बूथों को तीन श्रेणियों में बांटा गया- मजबूत, फोकस्ड (मध्यम) और कमजोर. फोकस्ड बूथ वे थे जहां 2021 में हार-जीत का अंतर बहुत कम था और पार्टी ने अपनी पूरी ताकत वहीं झोंक दी.
बीजेपी ने ‘पन्ना प्रमुख’ सिस्टम भी लागू किया, जहां एक कार्यकर्ता की जिम्मेदारी 30-60 मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक लाने की थी. सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव जैसे दिग्गज नेताओं को इसका माइक्रो-मैनेजमेंट सौंपा गया.
SIR विवाद ने बदल दी चुनाव की दिशा
SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ऑफ इलेक्टोरल रोल्स 2026 के बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा और सबसे विवादित मुद्दा बन गया. इस प्रक्रिया के तहत बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, जो राज्य के कुल मतदाताओं का 11.85% था. यह संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ रह गया.
खास बात यह रही कि सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल और मटुआ-राजबंशी समुदाय के इलाकों से काटे गए. मुर्शिदाबाद में 4.55 लाख, उत्तर 24 परगना में 3.25 लाख और मालदा में 2.39 लाख नाम हटाए गए. नादिया में तो जांच के दायरे में आए 77.86% मतदाताओं के नाम ही काट दिए गए. कम से कम 44 विधानसभा सीटों पर हटाए गए नामों की संख्या 2021 के जीत के अंतर से अधिक थी. TMC ने इसे ‘संवैधानिक अपराध’ करार दिया. ममता बनर्जी ने चकदहा की एक रैली में आरोप लगाया कि अल्पसंख्यक बहुल जिलों में ‘जूं की तरह नाम चुन-चुनकर निकाले गए.’
ममता बनर्जी के सबसे मजबूत महिला वोट बैंक में लगाई सेंध
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनका महिला वोट बैंक रहा है, जो उन्हें लगातार 15 सालों से सत्ता में बनाए रखने का मुख्य आधार था. बीजेपी ने इस बार इसी किले को भेदने की पूरी कोशिश की. पार्टी ने 9 अप्रैल 2026 को कोलकाता में अपना संकल्प पत्र जारी किया, जिसमें अमित शाह ने हर महिला को 3,000 रुपये प्रति माह देने का वादा किया. यह ममता की लक्ष्मीर भंडार योजना (1,500 रुपये) का दोगुना था.
बीजेपी ने चुनावों को सिर्फ आर्थिक वादों तक ही सीमित नहीं रखा…
- आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार कांड और संदेशखाली की घटनाओं के बाद, बीजेपी ने ‘महिला सुरक्षा’ को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया.
- अमित शाह ने संकल्प पत्र में ‘दुर्गा सुरक्षा दस्ता’ नामक एक महिला पुलिस इकाई, हर ब्लॉक में महिला थाना और ‘मातंगिनी हाजरा’ और ‘रानी रासमणि’ के नाम पर दो महिला बटालियन बनाने का वादा किया.
- हर जिले में वर्किंग विमेंस हॉस्टल, 75 लाख ‘लखपति दीदी’ बनाने और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण देने का भी ऐलान किया.
बंगाल की ‘शाक्त परंपरा’ और ‘माछ-भात’ को लेकर बीजेपी ने बदली छवि
बीजेपी ने 2026 के चुनाव में अपनी छवि को एक ‘उत्तर भारतीय शाकाहारी ब्राह्मणवादी पार्टी’ से निकालकर ‘बंगाल की मिट्टी से जुड़ी पार्टी’ में बदलने का बहुत ही सोचा-समझा प्रयास किया. यह रणनीति तब शुरू हुई जब 29 मार्च 2026 को पुरुलिया की एक सभा में ममता बनर्जी ने कहा कि ‘अगर बीजेपी सत्ता में आई, तो वे मछली, मांस और अंडा नहीं खाने देंगे.’
इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और सांसद मनोज तिवारी ने सार्वजनिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मछली-भात खाया, जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए. कुछ बीजेपी उम्मीदवारों ने तो मछली के साथ जुलूस भी निकाले. पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनका हिंदुत्व बंगाल की ‘शाक्त परंपरा’ (देवी शक्ति की पूजा) के अनुकूल है, जहां मछली को सिर्फ भोजन नहीं बल्कि ‘महाप्रसाद’ माना जाता है .
बीजेपी ने ‘काबा बनाम मां काली’ का नैरेटिव भी तैयार किया. TMC सांसद सयानी घोष ने चुनाव प्रचार के दौरान एक रैली में ‘मेरे दिल में है काबा और मेरी आंखों में मदीना’ गीत गाया, जिसका वीडियो वायरल हो गया. इस पर अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि ‘TMC के दिल में काबा-मदीना हो सकता है, लेकिन बंगाल के दिल में केवल मां काली और मां दुर्गा बसती हैं.’
सवाल 1: इसके बावजूद अगर बीजेपी हारी तो यह हार कितनी बड़ी होगी?
जवाब: यह हार सामान्य चुनावी हार से कहीं बढ़कर होगी. गृह मंत्री अमित शाह ने 15 दिनों तक बंगाल में कैंप करके ‘साइलेंट मिशन’ चलाया, हर बूथ पर ‘पन्ना प्रमुख’ तैनात किए, SIR के तहत लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाने का विवादास्पद कदम उठाया गया, महिलाओं को लुभाने के लिए 3,000 रुपये प्रति माह देने का वादा किया, ‘शाक्त हिंदुत्व’ और ‘काली बनाम काबा’ जैसे नैरेटिव गढ़े.
अगर इतनी बड़ी पूंजी, प्रधानमंत्री मोदी की 21 रैलियां और अमित शाह की देर रात की मैराथन बैठकों के बावजूद पार्टी 2021 के 77 सीटों के आंकड़े को भी पार नहीं कर पाती, तो यह साबित हो जाएगा कि बीजेपी ममता बनर्जी के राज्य में कमल नहीं खिला सकती है. यह राज्य में पार्टी की राजनीतिक सीमा को रेखांकित कर देगी.
सवाल 2: हार की स्थिति में कौन से बड़े नेता लाइन से नपेंगे?
जवाब: अगर ऐड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ता है, तो कई बड़े नेता इसकी चपेट में आएंगे…
1. प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य: सबसे पहली और सीधी जवाबदेही प्रदेश अध्यक्ष की होगी. सामिक भट्टाचार्य को जुलाई 2025 में सुकांत मजूमदार की जगह यह जिम्मेदारी दी गई थी. उन्होंने पूरे चुनाव की कमान संभाली और यह दावा किया कि पार्टी ‘आरामदायक बहुमत’ से जीतेगी.
2. नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी: मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे चल रहे और खुद को ममता बनर्जी के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश करने वाले शुभेंदु अधिकारी पर भी बड़ा दबाव होगा. वे नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों जगहों से चुनाव लड़े. इस बार अगर वे अपनी पकड़ वाले क्षेत्रों में भी पार्टी का प्रदर्शन नहीं सुधार पाते, तो उनकी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को गहरा धक्का लगेगा.
3. गृह मंत्री अमित शाह: वे राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं और उन पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन बंगाल चुनाव को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने का राजनीतिक नुकसान जरूर होगा. एक हार उनकी चुनावी रणनीति की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है.
4. सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव: एक है- बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल, जो अमित शाह के करीबी माने जाते हैं और जिन्हें बंगाल का प्रभारी बनाया गया था. दूसरे हैं- केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, जिन्होंने ‘शक्ति केंद्र’ और ‘पन्ना प्रमुख’ सिस्टम का माइक्रो-मैनेजमेंट संभाला. दोनों की भूमिका की भी गहन समीक्षा होगी. इन्हें विशेष रूप से बंगाल भेजा गया था ताकि 2021 की तरह बूथ स्तर पर चूक न हो और अगर फिर भी हार हुई तो इनकी रणनीतिक विफलता सामने आएगी.
सवाल 3: बंगाल की हार का 2027 के विधानसभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: बंगाल में लगातार दूसरी बड़ी हार का प्रभाव राज्य की सीमाओं से कहीं आगे तक जाएगा और यह 2027 में होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करेगा.
- ‘अजेयता’ की छवि को झटका: सबसे बड़ा नुकसान बीजेपी के उस नैरेटिव को होगा जिसमें वह खुद को हर चुनाव जीतने वाली कामयाब मशीन के रूप में पेश करती है. 2021 के बाद 2026 में लगातार दूसरी बार बंगाल में हार यह साबित कर देगी कि पार्टी की विस्तारवादी रणनीति की एक सीमा है. 2027 में उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में चुनाव लड़ रहे विपक्षी दल मजबूती से खड़े होंगे.
- सांस्कृतिक रणनीति पर पुनर्विचार: बीजेपी ने बंगाल में उत्तर भारत के ‘सात्विक हिंदुत्व’ से हटकर स्थानीय ‘शाक्त हिंदुत्व’ का एक देशी मॉडल अपनाया. अगर यह सांस्कृतिक रूप भी विफल रहता है, तो पार्टी को ओडिशा, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में अपनी सांस्कृतिक रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा.
- अमित शाह की चुनावी रणनीति पर उठेंगे सवाल: शाह का ‘3 AM ब्लूप्रिंट’, जो पहले उत्तर प्रदेश और बिहार में सफल रहा था, अगर बंगाल में विफल होता है तो यह पार्टी के अंदर एक बड़ी रणनीतिक बहस को जन्म देगा. क्या हर राज्य में एक समान चुनावी मॉडल लागू किया जा सकता है? क्या क्षेत्रीय नेताओं और स्थानीय मुद्दों को अधिक महत्व देने की जरूरत है? यह सवाल 2027 के चुनावों की तैयारी के तरीके को सीधे प्रभावित करेगा.
- RSS की भूमिका: हार की स्थिति में RSS और उसके सहयोगी संगठनों की भूमिका की भी समीक्षा होगी, जिन्होंने जमीनी स्तर पर संपर्क और माहौल बनाने का काम किया था. पार्टी और संघ के बीच चुनावी रणनीतियों को लेकर मतभेद उभर सकते हैं.
- संगठनात्मक नुकसान: सबसे ठोस नुकसान कार्यकर्ताओं के मनोबल का होगा. इतनी मेहनत के बाद हार कार्यकर्ताओं को निराश करेगी और 2027 के चुनावों में पार्टी के लिए बूथ स्तरीय संरचना को फिर से खड़ा करना और भी मुश्किल हो जाएगा.